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Blog / 14 Feb 2025

फ्रीबी संस्कृति पर SC की टिप्पणी

संदर्भ: हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों और सरकारों द्वारा चुनावों से पहले दी जाने वाली "फ्रीबी" (नि:शुल्क योजनाओं) की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की है। बेघर लोगों के लिए शेल्टर होम्स पर सुनवाई के दौरान, अदालत ने यह विचार किया कि क्या ऐसी नीतियाँ लोगों को काम करने के लिए प्रोत्साहित करने की बजाय, बिना किसी प्रयास या योगदान के संसाधन प्रदान कर उन्हें काम करने से हतोत्साहित कर सकती हैं।

मुख्य मुद्दे:

1.   श्रम भागीदारी पर प्रभाव: न्यायमूर्ति गवई ने फ्रीबी के प्रभाव पर चर्चा की, विशेषकर महाराष्ट्र में, जहां मुफ्त संसाधनों (provisions) की उपलब्धता के कारण कृषि श्रमिकों की कमी हो गई है। चिंता यह है कि अगर आवश्यक संसाधन बिना किसी मूल्य के उपलब्ध कराए जाते हैं, तो लोग रोजगार प्राप्त करने की आवश्यकता महसूस नहीं कर सकते।

2.   निर्भरता का निर्माण: न्यायालय ने यह भी विचार किया कि बिना काम के वित्तीय सहायता देने से लोग सरकार पर निर्भर हो सकते हैं। ऐसे में, जहां ये नीतियाँ आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने का उद्देश्य रखती हैं, वहीं वे व्यक्तियों को सरकारी सहायता पर निर्भर बना सकती हैं यह नीति समग्र उत्पादकता और आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकती हैं।

3.   राजनीतिक प्रेरणाएँ: केस की सुनवाई के दौरान एक और पहलू जो सामने आया, वह था फ्रीबी नीतियों का चुनावों के निकट समय पर लागू होना। इसने यह बहस उठाई कि क्या ये उपाय मुख्य रूप से जन कल्याण के लिए होते हैं, या इन्हें मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए एक रणनीति के रूप में उपयोग किया जाता है।

फ्रीबी बनाम कल्याण योजनाएँ:
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी 2022 की रिपोर्ट में फ्रीबीज को 'जन कल्याण उपायों के रूप में परिभाषित किया है, जो निःशुल्क प्रदान किए जाते हैं।' ये आमतौर पर तात्कालिक राहत प्रदान करने वाली योजनाएँ होती हैं और इनमें मुफ्त लैपटॉप, टीवी, साइकिलें, बिजली और पानी जैसी वस्तुएं शामिल होती हैं, जिन्हें अक्सर चुनावी प्रोत्साहन के रूप में उपयोग किया जाता है। हालांकि, कुछ का मानना है कि ये आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के बजाय निर्भरता को बढ़ावा देती हैं।

कल्याण योजनाएँ ऐसे व्यवस्थित कार्यक्रम होते हैं, जिनका उद्देश्य जीवन स्तर में दीर्घकालिक सुधार और आवश्यक संसाधनों तक पहुंच को सुनिश्चित करना होता है। ये योजनाएँ राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों (DPSPs) में निहित होती हैं और सामाजिक न्याय के लक्ष्यों से जुड़ी होती हैं, जिनका उद्देश्य स्थायी लाभ प्रदान करना है।

कल्याण योजनाओं के उदाहरण हैं:

  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) – खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना।
  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) – रोजगार के अवसर प्रदान करना।
  • मध्याह्न भोजन (MDM) योजना बच्चों के पोषण और शिक्षा को संबोधित करना।

निष्कर्ष:
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ फ्रीबी नीतियों के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर हो रही बहस को सामने लाती हैं। हालांकि ये नीतियाँ जरूरतमंदों को तुरंत राहत दे सकती हैं, लेकिन इनके लंबे समय तक होने वाले प्रभाव, विशेषकर काम करने की इच्छा और आत्मनिर्भरता पर सवाल उठ रहे हैं। इस चर्चा से यह स्पष्ट होता है कि नीति निर्माण में तात्कालिक मदद और लंबे समय तक होने वाले आर्थिक सामाजिक विकास के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। आगे की सुनवाई में फ्रीबी नीतियों के कानूनी और नैतिक पहलुओं पर चर्चा हो सकती है।