संदर्भ :
हाल ही में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री द्वारा परिसीमन प्रक्रिया को लेकर व्यक्त की गई चिंताओं ने राष्ट्रीय स्तर पर परिसीमन की चर्चा को जन्म दिया है।
विवाद का विषय:
· पिछली परिसीमन प्रक्रिया 1971 की जनगणना के आधार पर की गई थी, जिसके बाद जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के लिए लोकसभा सीटों की संख्या स्थिर कर दी गई थी।
हालांकि, भारत में जनसंख्या वृद्धि दर क्षेत्रीय रूप से असमान रही है —
· उत्तर भारत के राज्य (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान) में जनसंख्या वृद्धि तेज रही।
· दक्षिण भारत के राज्य (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश) अपेक्षाकृत कम वृद्धि दर दर्ज की, जिससे उन्हें आशंका है कि परिसीमन के बाद उनकी संसदीय सीटें घट सकती हैं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर हो सकता है।
परिसीमन:
· परिसीमन (Delimitation) भारत में चुनावी निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः निर्धारित करने की प्रक्रिया है, जिसे जनसंख्या में हुए परिवर्तनों के आधार पर प्रत्येक जनगणना के बाद किया जाता है। इसका उद्देश्य संसद और राज्य विधानसभाओं में सीटों का ऐसा पुनर्वितरण सुनिश्चित करना है, जिससे जनसंख्या और प्रतिनिधित्व का संतुलन बना रहे।
संवैधानिक प्रावधान:
अनुच्छेद 82 और अनुच्छेद 81 के तहत संविधान द्वारा परिसीमन अनिवार्य है:
· अनुच्छेद 82 के अनुसार प्रत्येक जनगणना के बाद जनसंख्या परिवर्तन के आधार पर लोकसभा सीटों के आवंटन को फिर से समायोजित किया जाना चाहिए।
· अनुच्छेद 81 लोकसभा में 550 सदस्यों की सीमा निर्धारित करता है, जिसमें 530 सदस्य राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं और 20 केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसका उद्देश्य राज्यों में जनसंख्या के अनुपात में सीटों की एकरूपता बनाए रखना भी है।
परिसीमन का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि संसद और राज्य विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व समान हो, ताकि प्रत्येक मतदाता के वोट का समान महत्व हो।
भारत में परिसीमन का इतिहास:
1. 1976 से पूर्व : 42वें संशोधन से पहले, 1951, 1961 और 1971 की जनगणनाओं के बाद परिसीमन हुआ था। इस अवधि के दौरान, जनसंख्या वृद्धि के आधार पर लोकसभा, राज्यसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों का पुनर्वितरण किया गया, जिससे निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं में परिवर्तन हुआ।
2. 42वां संशोधन (1976): आपातकाल (1975-77) के दौरान, 42वें संशोधन के तहत 2001 की जनगणना तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की संख्या को स्थिर (Frozen) कर दिया गया। इसका उद्देश्य यह था कि जनसंख्या वृद्धि दर में क्षेत्रीय असमानता के कारण उच्च प्रजनन दर वाले राज्यों - मुख्यतः उत्तरी भारत - को अतिरिक्त राजनीतिक लाभ न मिल सके, जबकि दक्षिणी राज्यों में अपनाए गए जनसंख्या नियंत्रण प्रयासों को प्रोत्साहित किया जा सके।
3. 2001 परिसीमन: 2001 की जनगणना के बाद परिसीमन आयोग का गठन किया गया, जिसने निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया। हालांकि, दक्षिणी राज्यों की आशंकाओं को देखते हुए लोकसभा और विधानसभाओं की कुल सीटों की संख्या अपरिवर्तित रखी गई, ताकि कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व प्रभावित न हो।
आगे की राह :
परिसीमन बहस का एक संभावित समाधान लोकसभा सीटों की संख्या को 543 तक सीमित करना है। इससे राज्यों में प्रतिनिधित्व का मौजूदा संतुलन बना रहेगा, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि जिन राज्यों ने अपनी जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है, वे राजनीतिक प्रभाव नहीं खोएंगे।
एक अन्य दृष्टिकोण यह हो सकता है कि प्रत्येक राज्य में विधायकों की संख्या उनकी अनुमानित जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में बढ़ाई जाए। इससे देश के संघीय ढांचे को बनाए रखते हुए लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाया जा सकता है।