परिचय:
हाल ही में राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 (DPDP एक्ट)की धारा 44(3) को हटाने की मांग की है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह प्रावधान सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 को कमजोर कर सकता है और पारदर्शिता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
पृष्ठभूमि:
DPDP एक्ट का उद्देश्य डिजिटल निजी डेटा के इस्तेमाल को नियंत्रित करना है, ताकि व्यक्तिगत गोपनीयता (Privacy) और डेटा प्रोसेसिंग की जरूरतों के बीच संतुलन बना रहे। धारा 44(3) के तहत RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) में बदलाव किया गया है, जिससे व्यक्तिगत जानकारी से जुड़ी जानकारी साझा करने के नियमों में बड़ा बदलाव हो सकता है।
विवादित संशोधन:
पहले RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत यह प्रावधान था कि यदि किसी व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक करने से कोई बड़ा सार्वजनिक हित नहीं जुड़ा है या इससे किसी व्यक्ति की गोपनीयता का उल्लंघन होता है, तो ऐसी जानकारी देने की बाध्यता नहीं होगी। लेकिन अगर सार्वजनिक हित ज्यादा महत्वपूर्ण है, तो जानकारी दी जा सकती थी।
लेकिन धारा 44(3) के तहत प्रस्तावित संशोधन में यह प्रावधान कर दिया गया है कि सार्वजनिक संस्थान (Public Authorities) "व्यक्तिगत जानकारी" से जुड़ा कोई भी डेटा साझा करने के लिए बाध्य नहीं होंगे।
मुख्य चिंताएँ:
1. सूचना के अधिकार पर असर: आलोचकों का कहना है कि यह बदलाव नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार को कमजोर कर देगा। पहले आम जनता और सांसदों को समान रूप से सूचना प्राप्त करने का अधिकार था, लेकिन अब सरकार इसे सीमित कर सकती है।
2. सरकार के अधिकारों का दुरुपयोग: आलोचकों को डर है कि सरकार "व्यक्तिगत जानकारी" की परिभाषा को बहुत व्यापक बना सकती है, जिससे कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ सार्वजनिक नहीं हो पाएंगी। इससे सरकारी कामकाज में गोपनीयता बढ़ेगी और पारदर्शिता घटेगी।
3. जवाबदेही और पारदर्शिता पर असर: अगर सरकार इस प्रावधान का उपयोग करके सूचना साझा करने से इनकार करती है, तो सार्वजनिक अधिकारी और सरकारी नीतियों को जवाबदेह ठहराना मुश्किल हो जाएगा, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होगी।
निष्कर्ष:
धारा 44(3) को लेकर विवाद यह दिखाता है कि व्यक्तिगत गोपनीयता की रक्षा और सार्वजनिक सूचना के अधिकार के बीच संतुलन बनाना कितना चुनौतीपूर्ण है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नीति निर्माता और सांसद इस मुद्दे को कैसे हल करते हैं, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे, साथ ही व्यक्तिगत गोपनीयता भी सुरक्षित रहे।