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Blog / 27 Feb 2025

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर केंद्र – राज्य गतिरोध

संदर्भ:

हाल ही में केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि जब तक तमिलनाडु राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के कार्यान्वयन के लिए सहमति प्रदान नहीं करता, तब तक राज्य को समग्र शिक्षा अभियान के अंतर्गत स्वीकृत 2,000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता उपलब्ध नहीं कराई जाएगी। इस निर्णय ने केंद्र और राज्य सरकार के बीच शिक्षा नीति को लेकर पहले से चल रहे संघीय टकराव (federal tussle) को और अधिक गहरा कर दिया है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में त्रि-भाषा फॉर्मूला:

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने वर्ष 1968 में प्रस्तुत किए गए त्रि-भाषा सूत्र (Three-Language Formula) को बरकरार रखा है, किंतु विशेष रूप से गैर-हिंदी भाषी राज्यों जैसे कि तमिलनाडु के संदर्भ में इसमें अधिक लचीलापन प्रदान किया गया है। नीति के अनुसार, राज्यों को तीन भाषाओं के चयन की स्वतंत्रता दी गई है, बशर्ते कि उनमें से कम से कम दो भाषाएँ भारतीय भाषाएँ हों। यह प्रावधान विशेष रूप से भाषा थोपने को लेकर व्यक्त की जाने वाली आशंकाओं को कम करने का प्रयास करता है, क्योंकि यह राज्यों को हिंदी को अपनाने या अपनाने का विकल्प भी प्रदान करता है।
  • नीति में संस्कृत को भी एक ऐच्छिक भाषा के रूप में शामिल किया गया है, जिसका उद्देश्य संस्कृत भाषा के संरक्षण एवं पुनरुद्धार को प्रोत्साहित करना है। हालांकि, इसके व्यावहारिक कार्यान्वयन में कई चुनौतियाँ सामने सकती हैं, जिनमें प्रमुख हैं सीमित संसाधन,प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता तथा भाषाई विविधता के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता।

तमिलनाडु का विरोध :

  • तमिलनाडु ने ऐतिहासिक रूप से हिंदी को अनिवार्य बनाने के प्रयासों का निरंतर विरोध किया है। इसकी शुरुआत 1937 में हिंदी थोपने के खिलाफ, विरोध प्रदर्शन से हुई थी। इसके बाद, वर्ष 1965 और 1968 में राज्य उग्र विरोध प्रदर्शनों का साक्षी बना, जिससे हिंदी के प्रति तमिलनाडु का रुख और अधिक कठोर हो गया।
  • हालाँकि, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अंतर्गत राज्यों को अपनी इच्छानुसार तीन भाषाओं का चयन करने की स्वतंत्रता दी गई है, किंतु तमिलनाडु को यह आशंका है कि व्यवहारिक स्तर पर हिंदी को स्वत: तीसरी भाषा बना दिया जाएगा। यह स्थिति तमिल जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को हाशिए पर डालने का जोखिम पैदा करती है।
  • इसके अतिरिक्त, अन्य भाषाओं के प्रशिक्षित शिक्षकों की अनुपलब्धता भी एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है, जिससे व्यवहार में लचीली भाषा नीति को लागू करना कठिन हो सकता है। इस संदर्भ में, केंद्र सरकार द्वारा गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी शिक्षकों को प्रोत्साहित करने हेतु घोषित 50 करोड़ की सहायता राशि ने तमिलनाडु की शंकाओं को और बल दिया है। इसका मुख्य कारण यह है कि ऐसी कोई समान सहायता योजना दक्षिण भारतीय या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लिए नहीं है। इससे यह संदेश जाता है कि केंद्र की प्राथमिकता हिंदी को बढ़ावा देना है, जबकि अन्य भाषाओं के संवर्धन की कोई ठोस पहल नहीं की जा रही है।

समाधान:

इन चिंताओं को दूर करने के लिए केंद्र सरकार और तमिलनाडु के बीच एक रचनात्मक बातचीत आवश्यक है। तमिलनाडु सरकार के अनुसार दो-भाषा नीति ने सकारात्मक शैक्षिक परिणामों में योगदान दिया है और त्रि-भाषा नीति इस प्रगति को बाधित कर सकती है। ऐसे में एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो राष्ट्रीय शैक्षिक उद्देश्यों के साथ संरेखित करते हुए क्षेत्रीय स्वायत्तता का सम्मान करती हो।

निष्कर्ष:

एनईपी 2020 के तीन-भाषा फॉर्मूले का उद्देश्य बहुभाषावाद को प्रोत्साहित करना है, हालाँकि, हिंदी थोपने की शंकाओ के कारण इसे तमिलनाडु से कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। राष्ट्रीय एकता और शैक्षिक उन्नति को बढ़ावा देते हुए क्षेत्रीय भाषाई विविधता को बनाए रखने के लिए लिए एक सहकारी और लचीला दृष्टिकोण आवश्यक है।