होम > Daily-current-affairs

Daily-current-affairs / 02 Apr 2025

भारत में गहरे समुद्र की खोज: चुनौतियाँ, प्रगति और रणनीतिक आवश्यकताएँ

image

संदर्भ:

भारत ने हाल ही में गहरे समुद्र की खोज के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। मत्स्य-6000 नामक पनडुब्बी का सफल परीक्षण किया गया, जो समुद्र की सतह से 6,000 मीटर की गहराई तक गोता लगाने में सक्षम है। यह महत्वपूर्ण कदम भारत के पहले गहरे समुद्र के मानव मिशन को शुरू करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। इस उपलब्धि के साथ, भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जो महासागर की अतल गहराइयों की खोज करने में सक्षम हैं। हालांकि, गहरे समुद्र की तकनीक केवल वैज्ञानिक खोज तक सीमित नहीं है। यह आर्थिक महत्वाकांक्षाओं, सुरक्षा चिंताओं और भू-राजनीतिक चुनौतियों से भी जुड़ी हुई है। चीन, फ्रांस, जापान, नॉर्वे, रूस, दक्षिण कोरिया और अमेरिका जैसे देश पहले से ही इस क्षेत्र में अग्रणी हैं और इसका उपयोग आर्थिक लाभ और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कर रहे हैं।

  • उदाहरण के लिए, चीन ने हाल ही में एक छोटी गहरे समुद्र की केबल-कटिंग डिवाइस विकसित की है, जिसे पनडुब्बियों पर लगाकर समुद्र के नीचे संचार और बिजली आपूर्ति के लिए बिछाई गई मजबूत केबलों को काटा जा सकता है। इस तरह की तकनीकें समुद्र की सैन्यीकरण की ओर बढ़ते कदम को दर्शाती हैं। ऐसे में, भारत को अपनी गहरे समुद्र की क्षमताओं को तेज़ी से विकसित करने की आवश्यकता है, ताकि वह राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक प्रगति और वैज्ञानिक अनुसंधान में पीछे रहे।

गहरे समुद्र की खोज का रणनीतिक और आर्थिक महत्व-

  • समुद्र विशाल और अभी भी काफी हद तक अज्ञात (Unexplored) क्षेत्र है, जिसमें असीम आर्थिक, वैज्ञानिक और रणनीतिक संभावनाएँ हैं। संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के अनुसार, प्रत्येक देश को अपनी विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) की 200 समुद्री मील (370 किमी) तक खोज और संसाधन दोहन का विशेष अधिकार होता है।
  • भारत की विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) का औसत समुद्री तल लगभग 3,741 मीटर की गहराई पर स्थित है, जो दुनिया की सबसे ऊँची इमारत बुर्ज खलीफा (828 मीटर) से चार गुना अधिक गहरा है। हालाँकि, यह मारियाना ट्रेंच के चैलेंजर डीप (10,000 मीटर से अधिक गहराई) की तुलना में कम है, जो वाणिज्यिक विमानों की उड़ान ऊँचाई से भी अधिक गहरा है।

भारत के लिए गहरे समुद्र की खोज के प्रमुख लाभ:

1.   संसाधन दोहन (Resource Extraction)

o    जीवित संसाधन: समुद्री जैव विविधता, मछली पालन और जलीय कृषि।

o    अजीवित संसाधन: गैस हाइड्रेट, पॉलीमेटैलिक नोड्यूल, दुर्लभ खनिज, तेल और प्राकृतिक गैस।

o    औषधीय उत्पाद: समुद्र में रहने वाले जीवों से निकाले गए जैव सक्रिय यौगिक, जिनका उपयोग चिकित्सा, फार्मास्यूटिकल्स और पोषण संबंधी उत्पादों में किया जा सकता है।

2.   वैज्ञानिक और जलवायु अनुसंधान

o    जलवायु परिवर्तन अध्ययन: समुद्री धाराओं, कार्बन संकलन और महासागरों के तापमान को समझकर जलवायु पैटर्न का पूर्वानुमान किया जा सकता है।

o    समुद्र तल मानचित्रण: समुद्र की भूगर्भीय संरचना को समझकर भूकंप की भविष्यवाणी, सुनामी मॉडलिंग और आपदा न्यूनीकरण में मदद मिल सकती है।

3.   अंडरवाटर इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी

o    अंडरसी केबल्स: वैश्विक इंटरनेट ट्रैफिक का 95% हिस्सा समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबल्स पर निर्भर करता है।

o    तेल पाइपलाइन्स: समुद्र के नीचे बिछी तेल और गैस पाइपलाइन्स वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं।

4.   सामरिक और समुद्री सुरक्षा

o    समुद्र में निगरानी: भारत की समुद्री सीमाओं की रक्षा के लिए गहरे समुद्र की निगरानी तकनीक विकसित करना आवश्यक है।

o    केबल सुरक्षा: विरोधी देश भारत की अंडरसी केबल्स को नुकसान पहुँचा सकती हैं। इससे संचार और वित्तीय नेटवर्क बाधित हो सकते हैं।

गहरे समुद्र की खोज में चुनौतियाँ

1.   दबाव और संरचनात्मक मजबूती

o    गहराई के साथ हर 10 मीटर पर दबाव 1 वायुमंडलीय (atm) बढ़ता है।

o    भारत की EEZ के समुद्री तल पर दबाव 380 atm से अधिक हो सकता है।

o    टाइटेनियम मिश्र धातु और उच्च शक्ति वाले कंपोजिट संरचनाएँ ही ऐसे दबाव को सहन कर सकती हैं।

2.   संचार सीमाएँ

o    रेडियो तरंगें पानी में नहीं फैल सकतीं, जिससे समुद्र के नीचे संचार मुश्किल हो जाता है।

o    ध्वनि तरंगें (Acoustic Signals) ही समुद्र के अंदर प्रभावी संचार का मुख्य साधन हैं।

o    VLF और ELF तकनीक पर भारत को अधिक निवेश की आवश्यकता है।

3.   उच्च लागत और तकनीकी बाधाएँ

o    अत्याधुनिक पनडुब्बियाँ, रोबोटिक सिस्टम और समुद्री अनुसंधान जहाज विकसित करने के लिए अरबों डॉलर के निवेश की जरूरत है।

भारत की मौजूदा पहल और कमियाँ-

भारत ने 2018 में गहरे समुद्र मिशन (Deep Ocean Mission - DOM) की शुरुआत की, जिसे पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा संचालित किया जाता है। मत्स्य-6000 पनडुब्बी इस मिशन का हिस्सा है।

हालाँकि, कई महत्वपूर्ण कमियाँ बनी हुई हैं:

  • गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की तकनीक में भारत पिछड़ा हुआ है।
  • अंडरसी सुरक्षा उपायों का अभी तक समुचित विकास नहीं हुआ है।
  • गहरे समुद्र की खनन और रोबोटिक्स तकनीक में निवेश अपर्याप्त है।

रणनीतिक सिफारिशें-

1.   संस्थागत और नीति सुधार

o    समुद्री विकास विभाग को एक स्वतंत्र मंत्रालय बनाया जाए।

o    गहरे समुद्र अनुसंधान केंद्र स्थापित किए जाएँ।

o    निजी क्षेत्र और सरकार के बीच साझेदारी को बढ़ावा दिया जाए।

2.   तकनीकी उन्नति

o    उन्नत सोनार और सेंसर तकनीक में निवेश किया जाए।

o    ROVs और AUVs जैसी स्वायत्त पनडुब्बियाँ विकसित की जाएँ।

3.   सुरक्षा और बुनियादी ढाँचा संरक्षण

o    समुद्री खतरों की निगरानी के लिए सतर्कता तंत्र विकसित किया जाए।

o    चीन जैसी ताकतों के समुद्री खतरे को रोकने के लिए रक्षात्मक रणनीति बनाई जाए।

4.   लक्ष्य आधारित मिशन

o    10-वर्षीय रणनीतिक योजना बनाई जाए।

o    गहरे समुद्र अनुसंधान और तकनीक के लिए बड़े स्तर पर वित्तीय सहायता दी जाए।

निष्कर्ष-

डीप ओशन मिशन के नेतृत्व में भारत की डीप-सी पहल, एक प्रमुख समुद्री शक्ति बनने की दिशा में एक आवश्यक कदम है। हालाँकि, स्थापित वैश्विक खिलाड़ियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए डीप-सी रिसर्च, सुरक्षा और तकनीक में महत्वपूर्ण प्रगति की आवश्यकता है। सागर के भीतर संसाधनों, डिजिटल कनेक्टिविटी और समुद्री सुरक्षा के बढ़ते महत्व को देखते हुए, भारत को गहरे समुद्र के विकास को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में लेना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि वह आर्थिक विकास और रणनीतिक सुरक्षा के लिए गहरे समुद्र की विशाल क्षमता का दोहन करने के लिए अच्छी तरह से सुसज्जित है।

 

मुख्य प्रश्न: गहरे समुद्र में खनिज, गैस हाइड्रेट्स और जैव विविधता सहित विशाल संसाधन हैं। इन संसाधनों के दोहन से जुड़ी चुनौतियों का मूल्यांकन करें और टिकाऊ और पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार दोहन के लिए रणनीतियों का प्रस्ताव करें।