महिला-पुरुष असमानता के बीच महिलाओं के अनुकूल रोजगार

आय और महिला-पुरुष असमानता हमारे जीवन के सत्य हैं। विडंबना यह है कि जहां तक रोजगार के बाजार की बात है, आय की असमानता का इतना स्पष्टï आभास किसी अन्य क्षेत्र में नहीं होता। आर्थिक उदारीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी युग के उदय ने देश की मध्य वर्गीय महिलाओं के लिए रोजगार और आय के अवसरों में खासा इजाफा किया है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि उद्योग जगत यानी कि श्रम आधारित क्षेत्रों में महिलाओं को वेतन भत्तों के मामले में अपेक्षाकृत अधिक भेदभाव झेलना पड़ता है।

विश्व बैंक के एक अध्ययन में श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी में तेज कमी दर्ज की गई। वर्ष 2004-05 से 2010-11 के बीच इसमें 12 से 14 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई। क्योंकि कृषि से इतर और अपने आवास के आसपास उनके लिए रोजगार के सुरक्षित अवसर नहीं थे। ऐसा तब हुआ जबकि नई सदी में आर्थिक वृद्घि का सबसे तेज दौर चल रहा था। कोई भी इस गिरावट की स्पष्टï वजह नहीं बता पाया। अंतरराष्टï्रीय श्रम संगठन के मुताबिक श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भारत 131 देशों में 120वें स्थान पर है।

इस क्रम में वह ब्राजील, चीन और पाकिस्तान को छोड़कर अन्य दक्षिण एशियाई पड़ोसी मुल्कों तक से पीछे है। कुछ लोग कयास लगाते हैं कि पुरुषों का बढ़ता आय स्तर खासतौर पर कृषि क्षेत्र से होने वाली आय में बढ़ोतरी के कारण महिलाओं को काम करने की जरूरत नहीं रह गई है। या फिर वे स्कूलों में लंबे समय तक रहती हैं। यह दलील पुरुष सत्तात्मक समाज के सोच पर ही जोर देती है। परंतु क्या ऐसी दलीलें पर्याप्त हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि है कि श्रम शक्ति में भागीदारी में हर उम्र की महिलाओं का योगदान कम हुआ है। यह बात स्कूल वाली दलील को खारिज करती है। दूसरी बात शहरी क्षेत्रों में स्कूलों में लड़कियों के नामांकन की घटनाओं में इजाफा हो रहा है जबकि उनके रोजगार में कोई कमी नहीं आई। तीसरी बात, चूंकि आर्थिक वृद्घि की गति कमजोर पड़ी है और इस बीच कृषि विकास दर अपेक्षाकृत तेज रही है तो इसका अर्थ यही हुआ कि महिलाओं को वर्ष 2009 तक श्रम शक्ति में वापस आ जाना चाहिए था।

लेकिन काम है कहां? यही तो समस्या है। महिला कामगारों के दो प्रमुख औद्योगिक रोजगार प्रदाता यानी विनिर्माण और कृषि मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संतोष मेहरा और शर्मिष्ठïा सिन्हा के एक अध्ययन के मुताबिक विनिर्माण और सेवा क्षेत्र जैसे दो अपेक्षाकृत तेज गति से विकसित होने वाले क्षेत्रों में महिलाओं के लिए महज 18 फीसदी ग्रामीण रोजगार हैं। कृषि क्षेत्र का 75 फीसदी के साथ दबदबा है। शहरी भारत की 2.73 करोड़ महिलाओं के लिए इन दोनों क्षेत्रों में 63 फीसदी रोजगार हैं जबकि कृषि में महज 3 फीसदी।

भले ही यह आंकड़ा किसी भी लिहाज से तुलना के योग्य नहीं है लेकिन यह बात जानकारी परक है कि राष्टï्रीय नमूना सर्वेक्षण संस्थान का एक सर्वेक्षण यह बताता है कि वर्ष 2009-10 और 2010-11 में ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं ने 91 लाख रोजगार गंवाए। यह वह अवधि है जब शहरी क्षेत्र की श्रम शक्ति में 35 लाख महिला कामगार शामिल हुईं। हालंाकि यह स्पष्टï नहीं है कि इन महिलाओं में कार्यालयीन कार्य करने वाली महिलाएं शामिल हैं या नहीं। लेकिन अगर हम शहरी भारत में महिला रोजगार के व्यापक परिदृश्य को देखें तो हमें अपने आसपास का बदलाव अधिक सहजता से नजर आएगा।

खुदरा उद्योग, स्वागत उद्योग, ई-कॉमर्स अथवा सूचना प्रौद्योगिकी और उससे जुड़ी सेवाओं में महिलाओं के लिए रोजगार के तमाम प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अनुभव हैं। लेकिन अंकेक्षण, बैंकिंग सलाहकार सेवा, इंजीनियरिंग, वास्तु, मीडिया और जैव प्रौद्योगिकी जैसे पारंपरिक तौर पर पुरुषों के दबदबे वाले रोजगारों ने भी महिलाओं के लिए अपने द्वारा खोल दिए हैं। आज कुछ रोजगार ऐसे हैं जिन्हें पूरी तरह महिलाओं के लिए माना जाता है। मानव संसाधन विकास, जनसंपर्क और मार्केटिंग आदि क्षेत्र इस मामले में प्रमुख हैं।

रोजगार के मामले में शहरी महिलाओं के पास चयन की जो स्वतंत्रता है वह उनकी ग्रामीण साथियों के पास नहीं है। उदाहरण के लिए यह बात ध्यान देने लायक है कि फैक्टरियों में शायद ही कोई महिला कर्मचारी नजर आए। हां, इलेक्ट्रॉनिक्स या कपड़ा क्षेत्र में जरूर महिलाएं दिख जाती हैं। बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों में महिलाएं इस क्षेत्र में जमकर काम कर रही हैं। चयन की यह सीमा विभिन्न लिंगों के बीच शिक्षा की असमानता से जुड़ी है। लेकिन इसका ताल्लुक भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के नियोक्ताओं के पूर्वग्रह से भी है।

जरा कार अथवा दोपहिया निर्माण पर विचार कीजिए। इनमें अधिकांश काम स्वचालित होते हैं। अब इस क्षेत्र में ताकत की ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है जो इसे केवल पुरुषों के लिए सुरक्षित कर दे। चाहे जो भी हो विनिर्माण के क्षेत्र में महिलाएं जिस कदर शारीरिक श्रम करती हैं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि यह कोई वजह नहीं है जिसके चलते महिलाओं को स्वचालित कार्य से दूर रखा जा सके। इसके बावजूद वाहन क्षेत्र या इंजीनियरिंग कंपनियों में कोई महिला नहीं नजर आती। इन कंपनियों में पर्यवेक्षक की भूमिका में भी महिलाएं नहीं दिखतीं। वहीं औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों यानी आईटीआई में भी बहुत कम महिला प्रशिक्षु नजर आती हैं।

देश की कुल 13 करोड़ महिलाओं की श्रम शक्ति में 10.02 करोड़ गांवों से संबंध रखती हैं। जबकि देश की कुल श्रमशक्ति 45 करोड़ है। जाहिर है यह देश में महिला-पुरुष समानता के मुंह पर तमाचा है। अगर हम मेक इन इंडिया की बात करें तो इसमें काफी संभावनाएं निहित हैं। खासतौर पर रक्षा क्षेत्र में। उदाहरण के लिए सोवियत अतिक्रमण के दिनों में अफगान विद्रोहियों की प्रिय रही स्टिंगर मिसाइलें अधिकांशत: अमेरिकी फैक्टरियों में महिलाओं द्वारा असेंबल की गई थीं।

REFERENCE :BUSINESS STANDARD

One Comment

  1. amit dwivedi-
    February 16, 2016 at 6:13 pm

    Good

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