तो क्या अब बैंकों के कर्जे भी वसूलकर सरकार तक पहुंचाए सुप्रीम कोर्ट?

तो क्या अब बैंकों के कर्जे भी वसूलकर सरकार तक पहुंचाए सुप्रीम कोर्ट?

सुप्रीम कोर्ट ने चार हफ्ते में उन सभी कर्जदारों की सूची सार्वजनिक करने के लिए कहा है जिन पर 500 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम बकाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने बकाएदारों के यहां फंसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लाखों करोड़ रुपए की वसूली में ढि़लाई को लेकर साल के पहले हफ्ते में ही सख्ती दिखाई। सर्वोच्च अदालत ने चार हफ्ते में उन सभी कर्जदारों की सूची सार्वजनिक करने के लिए कहा है जिन पर 500 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम बकाया है। इसके बावजूद इस पर केंद्र सरकार या रिजर्व बैंक की ओर से अब तक कोई हलचल नजर नहीं आ रही है। इससे पहले इसी दो जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने दो बडे़ कदम उठाए। एक तो बीसीसीआई के अदमनीय पदाधिकारियों को हटाकर उनकी औकात बता दी। दूसरे निर्णय के तहत यह कहा कि जाति-धर्म के नाम पर वोट मांगना भ्रष्टाचार है।

इससे पहले भी कोर्ट को ऐसे मुददों को भी हाथ में लेकर उन्हें तार्किक परिणति तक पहुंचाना पड़ा है जो काम प्रशासनिक कार्यपालिका या फिर चुनाव आयोग को कर देना चाहिए था। पर लगता है कि जब प्रभु वर्ग के हितों का मामला आता है तो सरकारी प्रतिष्ठानों को काठ मार जाता है। याद रहे कि सर्वोच्च अदालत ने गत अक्तूबर में कहा था कि सिर्फ 57 डिफाॅल्टर कर्जदारों के यहां बैंकों के 85 हजार करोड़ रुपए बाकी हैं। याद रहे कि कर्जदारों की सूची रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने मुहरबंद लिफाफे में अदालत को सौंपी दी है। पर जानकार सूत्रों के अनुसार रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार उस सूची को जगजाहिर करने को भी तैयार नहीं ।

डिफाॅल्टरों के प्रति सरकार की ऐसी ममता हैरान करती है। यानी अब क्या सुप्रीम कोर्ट को यह काम भी करना पड़ेगा कि वह कर्जदारों से बैंकों के कर्जे वसूल कर सरकार तक पहुंचा दे? जनहित के अधिकतर मामलों पर संसद में हंगामा होता रहता है। बात बात पर दोनों पक्षों में तू -तू मैं -मैं होती रहती है। लगता है कि इस देश में इन दिनों इस बात को लेकर  प्रतिस्पर्धा चल रही है कि टेलीविजन के टाॅक शो में ज्यादा शोर गुल हो या संसद में? लोकतंत्र के इन मंचों का ऐसा अवमूल्यन चिंताजनक है।

हां, सभी पक्षों में तब पूर्ण सहमति रहती है जब सांसदों के वेतन भत्ते बढ़ाने का विधेयक आता है। कैसे-कैसे मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है ? यह देख-सुनकर लोकतंत्र के भविष्य को लेकर कई लोगों को चिंता होती है। यानी जो काम कार्यपालिका को रूटीन काम की तरह पहले ही कर लेना चाहिए था, उस काम में भी जनहित में सुप्रीम कोर्ट को हाथ डालना पड़ रहा है। यदि किसी दिन सुप्रीम कोर्ट भी इस देश के अधिकतर नेताओं की तरह ही जनहित के प्रति लापारवाह हो जाए तो देश कैसे बचेगा?

हां, सुप्रीम कोर्ट ने भी समय -समय पर अपनी गलतियां सुधारते हुए अपने पिछले निर्णयों पर पुनर्विचार भी किया है।क्या राजनीतिक कार्यपालिका ने भी ऐसा पश्चाताप या प्रायश्चित कभी किया है? याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने आपात काल में दिए गए अपने एक मशहूर जजमेंट को खुद ही कुछ साल पहले गलत बताया। वह निर्णय बंदी प्रत्यक्षीकरण को लेकर था। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आपातकाल में नागरिक अपने मौलिक अधिकार की मांग नहीं कर सकता। उसमें जीने का अधिकार भी शामिल है।

पिछले साल तो सबसे बड़ी अदालत ने इस तरह के अनेक फैसले दिए और तल्ख टिपणियां कीं। क्या ऐसे रूटीन कामों के लिए ही संविधान निर्माताओं ने सुप्रीम कोर्ट का प्रावधान किया था? क्या इस देश में सरकार और बैंक ताकतवर डिफाॅल्टर्स से कर्ज वसूलने तक की
ताकत खो चुके हैं? सुप्रीम कोर्ट को पिछले साल बिहार के तीन बाहुबलियों से जुड़े मामलों में पटना हाई कोर्ट के फैसलों को बारी -बारी से बदलना पड़ा था।

जघन्य आपराधिक मामलों में जेल में बंद चर्चित मोहम्मद शहाबुददीन, राज बल्लभ यादव और राॅकी यादव को पटना हाई कोर्ट ने बारी -बारी से गत साल जमानत पर रिहा कर दिया था। जब बिहार सरकार ने जमानत के खिलाफ अपील की तो सुप्रीम कोर्ट ने बारी-बारी से तीनों को फिर जेल भेज देने का आदेश दे दिया। सवाल है कि यदि इस देश में सुप्रीम कोर्ट का अस्तित्व नहीं होता तो बिहार के शांतिप्रिय लोगों का क्या हाल होता?

मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के अधिकतर महाघोटाले के दोषियों को सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के कारण ही जेलों के हवाले किया जा सका था। 25 अगस्त 2014 को कोल आवंटन को अवैध करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश आरएम लोढ़ा ने कहा कि ‘यूपीए सरकार हो या एनडीए सरकार, सभी ने दिमाग का इस्तेमाल किए बिना कोल ब्लाॅक बांट दिए।’

आजादी के तत्काल बाद के वर्षों में प्रधान मंत्री और मुख्य मंत्री आम तौर पर स्वच्छ छवि के लोगों को ही मंत्री बनाते थे।अपवादों की बात और है। पर,जब इस देश में अनपढ़, अधपढ़, गुंडे और माफिया तक मंत्री बनाये जाने लगे तो सुप्रीम कोर्ट को इस पर भी 27 अगस्त 2014 को टिप्पणी करनी पड़ी। संविधान पीठ ने कहा कि प्रधान मंत्री और मुख्य मंत्री को यह चाहिए कि वे ऐसे व्यक्ति को मंत्री नहीं बनाएं जिनके खिलाफ अदालत ने आरोप गठित कर दिया हो। किसी शर्म वाली सरकार और राजनीति के लिए सबसे बड़ी अदालत की यह टिप्पणी काफी होनी चाहिए थी। पर ऐसा हो न सका।

सुप्रीम कोर्ट ने गत 14 सितंबर को केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किये। यह नोटिस सांसद, विधायक, लोक सेवक और न्याय पालिका से जुड़े लोगों के खिलाफ लंबे समय से जारी आपराधिक मुकदमों को लेकर है। इन्हें एक साल के भीतर निपटाने की मांग को लेकर मुकदमा दायर किया गया है। उसी याचिका के संदर्भ में नोटिस जारी किये गये हैं। कोर्ट ने जवाब मांगा है कि क्या किया जाए? इन दिनों ऐसे मामले आए दिन सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आते रहते हैं। इसकी बढ़ती संख्या भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ नहीं है जिसके संविधान में सत्ता संतुलन का प्रावधान किया गया है।

 

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