कितना सुरक्षित है साइबर संसार

कितना सुरक्षित है साइबर संसार

यह देखते हुए कि इस समय देश का पूरा फोकस डिजिटल लेन-देन की व्यवस्था बनाने पर है, छोटी घटनाएं भी उपभोक्ता का इस सिस्टम से भरोसा डिगा सकती हैं। खासतौर से यह तथ्य बेचैन करने वाला है कि अब लोगों को मोबाइल के जरिए भुगतान के लिए प्रेरित किया जा रहा है, पर एंड्रॉयड आधारित मोबाइल हैकिंग के सबसे आसान शिकार हो सकते हैं।

 

तकनीक और उससे जुड़ी समस्याओं को जब राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के नजरिए से देखा जाता है, तो समस्या सुलझने के बजाय उसके और उलझने का खतरा पैदा हो जाता है। ऐसा हाल में तब हुआ, जब अमेरिका ने रूस पर हैकिंग के जरिये अपने यहां राष्ट्रपति-चुनाव को प्रभावित करने का आरोप लगाया और पैंतीस रूसी राजनयिकों को निष्कासित कर दिया। अमेरिका का कहना है कि ये सभी जासूस थे और साइबर हैकिंग से उन्होंने हिलेरी को हराने के इंतजाम किए थे। यों रूस ने इस घटना पर अपेक्षया संयमित रुख अपनाया और पलटवार नहीं किया, पर अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कह कर चिंता जरूर पैदा कर दी है कि दुनिया का कोई भी कंप्यूटर सूचनाओं को सुरक्षित रखने के नजरिये से महफूज ठिकाना नहीं है। हमारे देश में भी इधर जिस प्रकार वित्तीय लेन-देन के डिजिटल उपाय किए जा रहे हैं, हैकिंग एक बड़ी समस्या के रूप में नजर आ रही है।
मामला तब और ज्यादा उलझ जाता है जब आए दिन कोई न कोई सरकारी वेबसाइट हैकरों से जूझती दिखाई पड़ती है। ऐसी एक हालिया घटना नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) की वेबसाइट को हैक करने के रूप में सामने आई है। माना जा रहा है कि खुद को ‘अलोन इंजेक्टर’ कहने वाले ये हैकर पाकिस्तान के हैं, क्योंकि इन्होंने एनएसजी की वेबसाइट पर मोदी के खिलाफ बातें लिख दीं और भारतीय पुलिस का एक नागरिक की पिटाई करने का वीडियो पोस्ट कर दिया। हैकिंग के बाद वेबसाइट पर ‘फ्री कश्मीर- आजादी हमारा मकसद’ जैसे नारे भी लिखे गए। सरकारी संगठनों की वेबसाइटों को हैक कर लिया जाना नया नहीं है। देश में पिछले साल अक्तूबर तक लगभग पंद्रह हजार सरकारी वेबसाइटों को हैक किया जा चुका था। इसी तरह हाल में जब एक ओर मोदी सरकार आतंकी संगठनों द्वारा सरकार के संवेदनशील मंत्रालयों और विभागों पर ताजा साइबर हमलों की रिपोर्ट मिलने पर उनसे निपटने के उपायों के बारे में सोच रही थी, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी पार्टी के ट्विटर अकाउंट हैक होने की खबरें आई थीं।

इधर, जब सरकार कोशिश कर रही है कि देश में डिजिटल लेन-देन का माहौल बने, तो सूचना यह भी आ चुकी है कि पिछले कुछ ही महीनों में साइबर अपराधी एटीएम-डेबिट कार्ड का डाटा हैक करके उन्नीस बैकों के ग्राहकों को करोड़ों का चूना लगा चुके हैं। हालांकि वैश्विक पैमानों पर यह घटना छोटी कही जाएगी, क्योंकि अमेरिका से प्रकाशित ‘द निल्सन रिपोर्ट’ के अक्तूबर 2016 के अंक के मुताबिक एटीएम-डेबिट, क्रेडिट व प्री-पेड भुगतान कार्डों से जुड़ी धोखाधड़ी की वारदातों में फंसी राशि 21.84 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच चुकी है। यही नहीं, हर तरह के साइबर अपराध की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था को अब सालाना 445 अरब डॉलर तक के नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है।

यह देखते हुए कि इस समय देश का पूरा फोकस डिजिटल लेन-देन की व्यवस्था बनाने पर है, छोटी घटनाएं भी उपभोक्ता का इस सिस्टम से भरोसा डिगा सकती हैं। खासतौर से यह तथ्य बेचैन करने वाला है कि अब लोगों को मोबाइल के जरिए भुगतान के लिए प्रेरित किया जा रहा है, पर एंड्रॉयड आधारित मोबाइल हैकिंग के सबसे आसान शिकार हो सकते हैं। सिक्योरिटी कंपनी ‘चेकप्वाइंट सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी’ के शोधकर्ताओं ने दुनिया भर के 90 करोड़ एंड्रॉयड आधारित स्मार्टफोन-धारकों को चेताया है कि हो सकता है वे किसी हैकिंग के शिकार हो जाएं, क्योंकि हैकर किसी भी फोन को अपने कब्जे में ले सकते हैं और फोन के सारे डाटा को निकाल सकते हैं। ऐसी स्थिति में उनके निजी आंकड़ों, फोटो के अलावा वित्तीय, खासतौर से बैंकिंग कामकाज प्रभावित हो सकता है। यहां तक कि उनके बैंक खातों में जमा पैसा भी अनजान खातों में ट्रांसफर हो सकता है।

साइबर सेंधमारी की ऐसी घटनाओं से बैंकों से लेकर सरकारों तक की नींद उड़ना स्वाभाविक है। जिस तरह से पिछले साल अंतरराष्ट्रीय हैकरों के एक गिरोह ने हमारे देश के तीन बैंकों और एक दवा कंपनी के कंप्यूटरों को अपने कब्जे में लेकर (हैक करके) उन्हें डीफ्रीज (वापस कामकाजी हालत में लौटाने) के बदले लाखों डॉलर वसूले हैं, ये घटनाएं अपने आप में एक बड़ी चेतावनी हैं। समस्या की विकटता का एक अंदाजा पिछले साल लगा था, जब देश के बैंकों के एटीएम को निशाने पर लेने वाले एक गिरोह का भंडाफोड़ हुआ था और उसके नौ हैकरों की गिरफ्तारी की गई थी। पता चला था कि यूक्रेन और रूसी हैकरों से आॅनलाइन ट्रेनिंग पाकर हैकरों के गिरोह ने अलग-अलग बैंकों के एटीएम से दो महीने के भीतर करोड़ों रुपए निकाल लिये थे और इसकी किसी को कानोंकान खबर तक न हुई। जबकि इसी वर्ष (2016) बांग्लादेश के सेंट्रल बैंक से 8.1 करोड़ डॉलर यानी करीब 550 करोड़ रुपए के बराबर रकम पर साइबर हैकरों ने हाथ साफ कर दिए थे। हैकिंग के जरिये हुई इस लूट का संजाल इतनी दूर तक फैला हुआ था कि इसका खुलासा होने में ही एक महीने से ज्यादा का वक्त लग गया। चार फरवरी, 2016 को घटित इस साइबर लूट के बाद बांग्लादेश के सेंट्रल बैंक के मुखिया अतिउर रहमान ने मामले में बरती गई लापरवाही की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था।

आज कोई देश यह दावा नहीं कर सकता कि उसकी जमीन से हैकिंग की कोई गतिविधि नहीं चल सकती है। यहां तक कि हमारे देश में भी कई हैकर स्वदेश और दुनिया को हैरान-परेशान करने वाले कारनामे कर रहे हैं। हालांकि उनकी धरपकड़ की जा रही है, पर फिलहाल इसकी कोई गारंटी नहीं कि निकट भविष्य में ऐसी किसी घटना की पुनरावृत्ति नहीं होगी। कंप्यूटर व इंटरनेट के जरिये लोगों व बैंकिंग, सुरक्षा आदि संगठनों के ईमेल व वेबसाइटों में सेंधमारी करके उन्हें नुकसान पहुंचाना और प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को गोपनीय सूचनाएं देकर फायदा पहुंचाने की यह हरकत गैरकानूनी है, लेकिन निगरानी के चाक-चौबंद सिस्टम का अभाव और यह समझ न बन पाना कि आखिर अनैतिक काम करने वाले सॉफ्टवेयर के जानकारों को कैसे पकड़ा जाए, ऐसे मामलों की सटीक पहचान व धरपकड़ में बाधक बन रही है। यह काम अमेरिका तक में नहीं हो पाया है, इसलिए विकसित देश भी सामरिक-आर्थिक हितों के संरक्षण के लिए ‘उलट हैकिंग’ व साइबर जासूसी का तरीका आजमाते आए हैं।

उलट हैकिंग असल में ‘एथिकल हैकिंग’ है जो आमतौर पर सरकारों की तरफ से गैरकानूनी ढंग से की जा रही हैकिंग का तोड़ ढूंढ़ती है और सरकारी कंप्यूटरीकृत इंतजामों के बचाव का प्रबंध करती है। इसके साथ-साथ देश में यह समझ भी बनाने की जरूरत है कि बैंक, रेलवे, सेना की वेबसाइटों से लेकर सोशल मीडिया के किसी मंच की हैकिंग आदि की घटनाएं असल में साइबर हमला हैं और इस तरह की गतिविधियां देश के आईटी कानूनों के मुताबिक आपराधिक हरकत हैं और इनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
सारी सावधानियों के बावजूद अभी यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि कोई वेबसाइट, ईमेल, फेसबुक पेज, ट्विटर हैंडल आदि हैकिंग से पूर्णत: सुरक्षित रह सकेंगे। इसकी पहली वजह असावधानी है। यदि किसी वेबसाइट को साइबर हमलों से सुरक्षित बनाने वाले उपायों से लैस नहीं किया गया है, तो इसकी काफी आशंका रहती है कि उसे हैक कर लिया जाएगा। यदि किसी ईमेल या सोशल मीडिया के किसी अकाउंट के पासवर्ड की गोपनीयता बरतने में असावधानी बरती जाती है तो उस पर साइबर हमले और उसके हैक होने की आशंका ज्यादा रहती है।

 

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