विमौद्रीकरण VI: नकदी-रहित अर्थव्यवस्था –II
(प्रोत्साहनकारी पहलें)

डिजिटल लेन-देन के सन्दर्भ मेंमुख्यमंत्रियों की समिति की सिफारिश
डिजिटल पेमेंट्स पर मुख्यमंत्रियों की समिति ने आधार परियोजना के पूर्व अध्यक्ष नंदन नीलेकणि को ट्रांजेक्शन शुल्क (MDR) की समीक्षा करने को कहा था। ध्यातव्यहै कि मर्चेट डिस्काउंट रेट(MDR) उस दर को कहते हैं जो POS टर्मिनल के जरिये होने वाले लेन-देन पर कारोबारियों से वसूला जाता है और जिसे कारोबारी सामान्यतः ग्राहक से वसूलते हैं।
इसी रिपोर्ट के आधार पर मुख्यमंत्रियों की समिति का मानना है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से कदम बढ़ाने से वित्तीय लेन-देन तेजी से बढ़ रहे हैं। इसे देखते हुए ट्रांजैक्शन शुल्क(MDR) को और अधिक कम की जरूरत है। इसलिए समिति ने आरबीआइ को इस संबंध में पेमेंट सेटलमेंट सिस्टम एक्ट,2007 की धारा 18के तहत् निर्देश जारी करने को कहा है। इसी अनुशंसा के आलोक में नीति आयोग ने भी रिजर्व बैंक से आग्रह किया कि डिजिटल पेमेंट्स की बढ़ती संख्या को देखते हुए डेबिट कार्ड से भुगतान पर लगने वाले ट्रांजैक्शन शुल्क (एमडीआर) को कम कर दिया जाए।
ध्यातव्य है कि रिजर्व बैंक ने 16 दिसंबर को एक अधिसूचना जारी कर बैंकों को निर्देश दिया है कि डेबिट कार्ड से एक हजार रुपये तक के ट्रांजैक्शन पर अधिकतम 0.25 प्रतिशत तथा एक हजार रुपये से दो हज़ाररुपये तक के ट्रांजेक्शन पर अधिकतम 0.5 प्रतिशत शुल्क ही लगाया जगाया जाए। रिजर्व बैंक का यह नियम एक जनवरी 2017 को प्रभाव में आएगा और 31 मार्च 2017 तक लागू रहेगा। फिलहाल 31 दिसंबर 2016 तक माफ हैं डेबिट कार्ड से लेन-देन पर चार्ज। आरबीआइ के इस कदम से पहले दो हजार रुपये तक के लेन-देन पर 0.75 प्रतिशत एमडीआर यानी ट्रांजेक्शन शुल्क लगाने का प्रावधान था। दो हज़ार रुपये से अधिक के ट्रांजेक्शन पर बैंक एक प्रतिशत तक एमडीआर वसूल सकते हैं।
लेकिन, बैंक MDR में कमी के इस प्रस्ताव से नाखुश हैं. उनका मानना है कि यद्यपि डिजिटल लेन-देन पर लगने वाले शुल्क का यौक्तीकरण अपेक्षित है, उससे पूरी तरह से छूट बैंकों के द्वारा किये जाने वाले निवेश को प्रतिकूलतः प्रभावित करेगा. रिज़र्व बैंक ने 31 मार्च, 2017 तक के लिए डेबिट कार्ड के ज़रिये एक हज़ार रुपये तक के लेन-देन पर अधिकतम 0.25% MDR और एक हज़ार-दो हज़ार रुपये के लेन-देन पर अधिकतम 0.5% MDR की सीमा निर्धारित की.
डिजिटल लेन-देन हेतु रोडमैप पर विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट
डिजिटल भुगतान के लिए रोडमैप प्रस्तुत करने के लिए वित्त सचिव रतन वाटल की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञ समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि समिति का मानना है कि नकदी-जीडीपी अनुपात को लगभग बारह प्रतिशत के वर्तमान स्तर से छः प्रतिशत के स्तर पर लाया जाना चाहिए और डिजिटल लेन-देन को अगले तीन वर्षों के दौरान 5% के वर्तमान स्तर से 20% के स्तर पर ले जाया जाय. यह तभी संभव है जब MDR उस अपेक्षित स्तर (optimal level) पर ले जाया जाय:
1. जो डिजिटल भुगतान के लिए न केवल कारोबारियों को प्रोत्साहित करे.
2. जो कारोबारियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करे कि वे डिजिटल लेन-देन के लिए ग्राहकों को भी प्रेरित करें.
3. साथ ही, यह उस न्यूनतम स्तर पर भी हो ताकि लागत को कवर कर सके और कार्ड के जारीकर्ता एवं डिजिटल भुगतान स्वीकारने हेतु POS टर्मिनल के जारीकर्ता को अधिकतर कारोबारियों को जोड़ने के लिए न्यूनतम प्रोत्साहन प्रदान करने में भी समर्थ हो सके.
नियामक के द्वारा MDR पर आरोपित सीमा को भुगतान-उद्योग के विकास को बाधित करने वाला मानते हुए इस रिपोर्ट में कहा गया है कि शुल्कों के सन्दर्भ में नियामकीय हस्तक्षेप न्यूनतम स्तर पर होना चाहिए और इसके निर्धारण की जिम्मेवारी बाज़ार-कारकों पर छोड़ देनी चाहिए. अधिक-से-अधिक नियामक संस्था के द्वाराइंटरचेंज फीसका साक्ष्य-आधारित नियमन किया जा सकता है. समिति का यह भी मानना है कि नियामकीय संस्थाओं को प्रवेश-अवरोध को हटाये जाने और भुगतान बाज़ार में बृहत्तर प्रतिस्पर्धा को सुनिश्चित करने पर फोकस करना चाहिए.
रिपोर्ट का विश्लेषण:
बैंकिंग सेक्टर में POS टर्मिनल के जरिये होने वाले लेन-देन पर ग्राहकों से लिए जाने वाले शुल्क को मर्चेंट डिस्काउंट रेट(MDR) के रूप में जाना जाता है जो परोक्षतः कारोबारियों पर लगाया जाता है और जिन्हें बिक्री की कीमत में वृद्धि के जरिये ग्राहकों पर ट्रान्सफर कर दिया जाता है. इस राशि का वितरण कार्ड जारी करने वाले बैंक(max.), POS टर्मिनल लगाने वाले बैंक और पेमेंट गेटवे के बीच वितरण होता है. रिज़र्व बैंक ने डेबिट कार्ड के लिए अधिकतम 1% के MDR का निर्धारण किया है, जबकि क्रेडिट कार्ड के सन्दर्भ में कोई सीमा न होने के कारण यह 2.5% तक हो सकता है. कैशलेस लेन-देन को प्रोत्साहन हेतु रिज़र्व बैंक ने 31 दिसम्बर तक के लिए MDR में छूट प्रदान की, लेकिन समिति की रिपोर्ट डिजिटल लेन-देन की लागत द्वारा उत्पन्न बोझ को ग्राहकों पर आरोपित करने के पक्ष में है जो ग्राहकों एवं बैंकों के बीच होनेवाले लेन-देन की प्रकृति और इससे बैंकों को होने वाले लाभों की अनदेखी करता है. इस तथ्य की अनदेखी करता है कि ग्राहकों द्वारा बैंकों की शाखाओं के जरिये किये जाने वाले वित्तीय लेन-देन यदि बैंकों पर 30-32 रुपये के वित्तीय बोझ सृजित करते हैं जिसका भार अबतक बैंकों के द्वारा वहां किया जाता था, तो एटीएम के जरिये लेन-देन की स्थिति में यह बोझ घटकर 14-15 रुपये हो जाता है. इस प्रकार डेबिट कार्ड बैंकों की लेन-देन लागत कम करता है. इस प्रश्न पर इसलिए भी विचार अपेक्षित है कि यह ग्राहकों का जमा पैसा ही है जिसे वे खर्च कर रहे हैं और जिसे उधारी के रूप में उपलब्ध कराने से बैंकों की भी कमाई होती है. साथ ही, ऐसे लेन-देन कीमत में वृद्धि के जरिये कीमत-बाज़ार में विकृति उत्पन्न करते हैं जो कारोबारियों के साथ-साथ ग्राहकों को कैशलेस लेन-देन के लिए हतोत्साहित करता है. अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसी स्थिति में बैंकों के द्वारा कारोबारियों से डेबिट कार्ड के जरिये होनेवाले लेन-देन पर शुल्क आरोपित किया जाना कहाँ तक उचित है? जहाँ तक क्रेडिट कार्ड का प्रश्न है, तो इस पर बैंकों द्वारा कारोबारियों से (1.5-2.5)% तक शुल्क आरोपित किया जाता है. प्रश्न यह उठता है कि शुल्क उससे लिए जाना चाहिए जो क्रेडिट-सुविधा का इस्तेमाल कर रहा है, या फिर किसी अन्य से? इस आलोक में देखें, तो समिति की अनुशंसाओं को स्वीकार किया जाना जहाँ डिजिटल लेन-देन के लिए प्लेटफार्म उपलब्ध करने वाली कम्पनियों के हितों के संवर्द्धन में सहायक हैं, वहीं इससे ग्राहक-हितों की अनदेखी होगी. सवाल यह उठता है कि सरकारी राजस्व और कॉर्पोरेट सेक्टर के हितों के लिए ग्राहक एवं उपभोक्ता हितों को दाँव पर लगाया जाना कहाँ तक उचित है?
फायदा बड़ी डिजिटल कंपनियों को:
समिति की अनुशंसाओं के आलोक में देखें, तो ऐसा लगता है कि डिजिटल भुगतान और कैसलैश इकोनोमी के लिए चलाये जा रहे अभियान के पीछे इस क्षेत्र से सम्बंधित बड़ी कारोबारी कंपनियों की लॉबिइंग है और आनेवाले समय में इसका सर्वाधिक फायदा अमेरिकी वीसा और मास्टर कार्ड सहित डिजिटल प्लेटफार्म उपलब्ध करने वाली देशी भुगतान कंपनियों और बैंकिंग सेक्टर को होगा जिनके पास बैंकिंग लेन-देन को प्रोसेस करवाने की तकनीक, नेटवर्क और ढाँचा है। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि इसी आशा में भारत में नोटबंदी की दिशा में की गयी इस पहल के बाद अमेरिका की वीसा, मास्टर कार्ड, एमेक्स आदि कंपनियों के शेयरों में ज़बर्दस्त उछाल आया।यही कारण है कि वैश्विक न्यूज एजेंसी ब्लूमबर्ग ने नकदी के खिलाफ भारत के अभियान में वीसा और मास्टर कार्ड कंपनियां के अंतिम विजेता होने की भविष्यवाणी की थी। इसका फायदा देशी पेमेंट गेटवे रूपे कार्ड, रिलांयस की जियो या पेटीएम आदि कंपनियों को भी होगा, लेकिन ये देशी कम्पनियां वीसा एवं मास्टर कार्ड की प्रतिस्पर्द्धा का सामना करने में सफल हो पाएंगी, इसमें संदेह है. ऐसा माना जा रहा है कि भारत के ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफार्म की तरह ये भी वैश्विक भुगतान कम्पनियों से प्रतिस्पर्द्धा में पिछड़ती चली जायेंगी।
डिजिटल लेन-देन में बैंक वीसा और मास्टर कार्ड जैसी कम्पनियों के प्रोसेस सिस्टम की सेवा लेते हैं और इसके बदले हर लेन-देन पर इनके द्वारा सेवा-प्रदाताओं से 0.11% सेवा-शुल्क की वसूली की जाती है। इस ऑनलाइन लेन-देन में वीसा-मास्टर कार्ड, बैंक-मर्चेंट बैंक, शॉपर खाते वाले बैंक की तीन कमीशनखोरी बनती है। पेमेंट प्रोसेसर के नाते अकेले मास्टर कार्ड कंपनी वैश्विक पैमाने पर कोई 24 हजार बैंक-वित्तिय संस्थाओं के क्रेडिट-डेबिट कार्ड में सेवा देता है।
यह आशंका पहले से जताई जा रही है कि वीसा और मास्टरकार्ड नेटवर्क नकदी खत्म कराने के लिए भारत सरकार पर लगातार दबाव बनाये हुए थे। मास्टरकार्ड कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भारतीय मूल के अजय बंगा भारत-अमेरिका सीईओ फोरम के सदस्य होने के नाते लगातार भारत सरकार के संपर्क में थे. उन्होंने भारत में कैशलेस लेनदेन की दिशा में पहल के लिए सरकार प्रोत्साहित भी किया और उस पर दबाव भी डाला।

नीति आयोग की प्रोत्साहन स्कीम:
15 दिसम्बर को नीति आयोग ने डिजिटल लेन-देन को प्रोत्साहन देने के लिए उपभोक्ताओं और कारोबारियों के लिए 340 करोड़ रूपये की पुरस्कार राशि के साथ लकी ग्राहक योजना और डिजिधन योजना शुरू की. लकी ग्राहक योजना के तहत् दैनिक और साप्ताहिक आधार पर उन ग्राहकों को लकी ड्रा के जरिये अधिकतम एक लाख रूपये का पुरस्कार दिया जाएगा जो 50 रुपये से 3000 रुपये तक की खरीददारी करते हैं. इसी प्रकार डिजिधन योजना के तहत् कारोबारियों को पचास हज़ार रुपये तक का पुरस्कार दिया जाएगा. इस योजना का फोकस गरीबों, मध्य वर्ग एवं छोटे कारोबारियों पर होगा ताकि उन्हें डिजिटल क्रांति का हिस्सा बनाया जा सके. इस योजना के दायरे में उन्हीं लेन-देनों को रखा जाएगा जो UPI, USSD, रूपे कार्ड और आधार-समर्थित भुगतान-व्यवस्था (AEPS) के दायरे में संपन्न हुए हैं. निजी क्रेडिट कार्ड और निजी कम्पनियों के वॉलेट के जरिये होनेवाले लेन-देनों को इसका लाभ नहीं मिलेगा. इस स्कीम का मेगा ड्रा आंबेडकर के जन्म-दिन 14 अप्रैल को संपन्न होगा जिसमें ग्राहकों को एक करोड़, पचास लाख एवं पच्चीस लाख और कारोबारियों को पचास लाख, पच्चीस लाख एवं पांच लाख की राशि पुरस्कारस्वरुप दी जायेगी.
इसी क्रम में केंद्र सरकार ने 20 दिसम्बर को बैंकों के माध्यम से लेन-देन की स्थिति में 66लाख तक के टर्नओवर वाले किसी भी कारोबारी को कोई टैक्स नहीं देना होगा। सरकार का कहना है कि ‘बैंकिंग के जरिये लेन-देन कर न केवल छोटे व्यापारी करीब 46% तक टैक्स बचा सकेंगे, वरन्बही-खातों के दुरुस्त होने के कारण उनके लिए बैंकों से क़र्ज़ लेना भी आसान होगा। इसके लिए सरकार ने आयकर(IT) अधिनियम में संशोधन के जरिये इसकी धारा 80C के तहत् प्रावधान किये जाने के संकेत दिए।
ध्यातव्य है कि आयकर अधिनियम की धारा 44D के मौजूदा प्रावधानों के तहत् सालाना 2करोड़ रुपए तक के टर्नओवर की स्थिति में 8% प्रॉफिट मानते हुए कर-दायित्व का निर्धारण किया जाता है, लेकिन संशोधित नियम के तहत् इसे 6% ही माना जाएगा । लेकिन संशोधित नियम के मुताबिक अब इस प्रॉफिट को 6 पर्सेंट मानते हुए टैक्स चार्ज किया जाएगा, जिससे कारोबारियों के कर-दायित्व में 30% तक की कमी आयेगी।
वेतन-भुगतान को नकदी-रहित बनाने के लिए वैधानिक पहल

अबतक की स्थिति:
जबसे कैशलेस इकोनॉमी की बात चली है, तभी से कहा जा रहा था कि सरकार को कर्मचारियों के वेतन-भुगतान को कैशलेस बनाने की दिशा में पहल करनी चाहिए. इससे आर्थिक लेन-देन में पारदर्शिता आयेगी और कर-वंचना की प्रवृत्ति हतोत्साहित होगी. लेकिन, इसके रास्ते में बाधक थे मजदूरी भुगतान अधिनियम के प्रावधान. ध्यातव्य है किवर्तमान में कर्मचारियों के वेतन का भुगतान अप्रैल,1936 को अस्तित्व में आए पेमेंट ऑफ वेजेज एक्ट, 1936 की धारा-6 के के तहत होता है। इसके अनुसार वेतन का भुगतान केवल नोटों या सिक्कों या फिर दोनों में किया जा सकता है। 1975 में इस कानून में संशोधन करते हुए इसमें चेक या बैंक खाते के जरिये वेतन-भुगतान से सम्बंधित प्रावधान को शामिल किया गया। अपने वर्तमान स्वरुप में धारा 6 अठारह हज़ार रुपये से कम वेतन पाने वाले कर्मचारियों को नकद या चेक किसी भी रूप में भुगतान का प्रावधान करता है, लेकिन नियोक्ता के लिए चेक से भुगतान हेतु कर्मचारियों की लिखित अनुमति आवश्यक है. दूसरी बात यह कि मौजूदा कानून अठारह हजार रुपए मासिक से कम वेतन पाने वाले कर्मचारियों को नगदी भुगतान की अनुमति प्रदान करता है। पर, उसमें नगदी-भुगतान के वैकल्पिक प्रावधान की मौजूदगी के कारण कर-चोरी के मकसद से कंपनियों का रूझान आंशिक या पूर्ण रूप से नकदी-भुगतान की ओर रहा है।

सरकार की वैधानिक पहल:
इसी आलोक में 21 दिसम्बर को नकदी पर निर्भरता को कम करने और डिजिटल लेन-देन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सरकार ने सभी उपक्रमों, संस्थानोंएवं कंपनियों में कर्मचारियों के वेतन का भुगतान चेक या फिर डिजिटल प्रणाली से करने के लिए कर्मचारी की लिखित अनुमति की आवश्यकता समाप्त करने की दिशा में अध्यादेश के जरिये पहल की गयी। विधेयक में कहा गया है कि यह नई प्रक्रिया डिजिटल और कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था के उद्देश्य को पूरा करती है।
सरकार ने यह स्पष्ट किया कि यह अध्यादेश नियोक्ताओं को नकदी में वेतन-भुगतान से नहीं रोकता है. इस संशोधन से फायदा केवल यह होगा कि अब चेक या ऑनलाइन वेतन-भुगतान के लिए कर्मचारी की सहमति लेने की कानूनी बाध्यता समाप्त हो गई है। इसके कारण नियोक्ता बैंकिंग-चैनल के जरिये वेतन-भुगतान करने के लिए प्रोत्साहित होंगे और इसके लिए नकदी पर उनकी निर्भरता को कम किया जा सकेगा. सरकार ने यह भी स्पष्ट किया किश्रम-संबंधी मामलों के समवर्ती सूची में आने के कारण राज्य सरकारें अध्यादेशके प्रावधानों को लागू करने या नहीं करने के लिए स्वतंत्र होंगी. उन्हें इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है. अतः केंद्र एवं राज्य सरकारें अधिसूचना के जरिये कैशलेस वेतन-भुगतान के दायरे में आनेवाले या न आनेवाले प्रतिष्ठानों के निर्धारण के लिए स्वतंत्र होंगी। केंद्र सरकार वेतन भुगतान के बारे में रेलवे, हवाई परिवहन-सेवाओं, खान, तेल क्षेत्र और स्वयं के प्रतिष्ठानों के मामले में नियम बना सकती है। अन्य मामलों में राज्यों को फैसला करना होता है। कानून में राज्य-स्तर पर संशोधन के जरिए केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना,उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा ने पहले ही चेक और इलेक्ट्रॉनिक तरीके से वेतन भुगतान का प्रावधान कर दिया है।

पहल से लाभ:
इसकी मांग लम्बे समय से सिविल सोसाइटी के द्वारा की जा रही थी और कहा जा रहा था कि वेतन-भुगतान में पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए चेक या इलेक्ट्रॉनिक ट्रान्सफर पर आधारित भुगतान व्यवस्था को स्वीकार किया जाना चाहिए ताकि नियोक्ता या अनुबंधकर्ता के अंतर्गत काम करने वाले कर्मचारियों की वास्तविक संख्या का पता लगाया जा सके. इससे कर्मचारी राज्य बीमा(ESI) और कर्मचारी प्रोविडेंट फण्ड(EPF) से सम्बंधित धोखाधड़ी पर प्रभावी तरीके से अंकुश लगाया जा सकेगा. ध्यातव्य है कि ESI स्व-वित्त पोषित सामाजिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य बीमा स्कीम है जिसका प्रबंधन राज्य के द्वारा किया जाता है, जबकि EPF का उद्देश्य कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति-बचत को प्रोत्साहित करना है जिसमें नियोक्ताओं एवं कर्मचारियों दोनों की ओर से अंशदान किया जाता है. सरकार के इस निर्णय का लाभ मनरेगा-मजदूरों को भी मिलेगा.
सरकार का मानना है कि इससे करों की चोरी, भ्रष्टाचार और आतंकवादी गतिविधियों में लगने वाले पैसे पर नजर रखना आसान होगा। अब ऐसा कहाँ तक हो पायेगा, यह बतला पाना तो मुश्किल है, पर इससे उन छोटे और मंझोले उद्यमों में काम करने वाले वे लोग कर-भुगतान के दायरेमें आ सकतेहैं, जिन्हें अबतक नकदी के रूप में वेतन प्राप्त होता था। लेकिन, ढाई लाख तक की आय के आयकर-मुक्त होने के कारण कर-राजस्व पर विशेष फर्क पडेगा, इसकी सम्भावना कम ही है।
समस्याजनक पहलू:
ऐसा माना जा रहा है कि सरकार की इस पहल का तात्कालिक उद्देश्य अगले महीने के आरम्भ में वेतन-भुगतान से सम्बंधित ज़रूरतों के कारण नकदी पर उत्पन्न होने वाले दबाव को कम करना है. यह भी कहा जा रहा है कि सरकार का यह फैसला कारोबार-जगत में इंस्पेक्टर-राज की वापसी के मार्ग को प्रशस्त कर सकता हैं। लेकिन, प्रश्न उठता है कि क्या इसके लिए आवश्यक तैयारियां की गईं और क्या बैंकिंग एवं टेलिकॉम ढांचा इसके लिए तैयार है? अनौपचारिक क्षेत्र के उन श्रमिकों को, जो अबतक वित्तीय बहिष्करण के शिकार होने के कारण वित्तीय ढांचे से बाहर हैं, बैंकिंग ढांचे के दायरे में लाये बिना उनकी नकदी-संबंधी ज़रूरतों को आखिर किस प्रकार पूरा किया जाएगा? इतना ही नहीं, इन श्रमिकों के वित्तीय साक्षरता एवं सूचनाओं तक पहुँच की स्थिति को देखते हुए क्या ऐसा नहीं लगता है कि यह कदम उनके नए सिरे से शोषण का मार्ग प्रशस्त करेगा? शायद यही कारण है कि श्रमिक संगठनों ने सरकार के इस फैसले और अध्यादेश की टाइमिंग का विरोध करते हुए कहा है कि नकदी-संकट की इस स्थिति में कर्मचारियों से अपना वेतन नकद में मांगने का अधिकार छीनना ठीक नहीं है। यह इन श्रमिकों के इस विकल्प को सीमित करता है कि वे अपना वेतन किस रूप में पाना चाहते हैं और इस सन्दर्भ में निर्णय के लिए सरकार को अधिकृत करते हुए उसे ये शक्तियां प्रदान करता है कि वे उन प्रतिष्ठानों को अधिसूचित कर सकते हैं जिन्हें अपने कर्मचारियों को चेक या ऑनलाइन ट्रान्सफर के ज़रिये प्रदान करना है. सरकार का यह विशेषाधिकार एक दूसरे स्तर पर भ्रष्ट-आचरण को प्रोत्साहित कर सकता है.
डिजिटल लेन-देन लागत में कमी की दिशा में पहल:
इसके अतिरिक्त 22 दिसम्बर को सरकार ने डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए सार्वजानिक क्षेत्र के बैंकों से नेट-बैंकिंग पर लगने वाले चार्जेज में कमी का निर्देश देते हुए कहा कि तत्काल भुगतान सुविधा(IMPS), नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फण्ड ट्रान्सफर(NEFT) और यूनिफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस(UPI)के जरिए होने वाले लेन-देन को पूरी तरह शुल्क-मुक्त करने के संकेत दिए। अबतक NEFT के जरिए होनेवाले लेन-देन पर शुल्क भी लगते हैं और सेवा कर भी चुकाना पड़ता है. अबतक NEFT के जरिये (1-10)हज़ार रुपये के फंड-ट्रांसफर पर 2.5 रुपये, (10 हज़ार- 1 लाख) रुपये पर5 रुपये,(1-2)लाख रुपये पर15 रुपये और 2 लाख से अधिक के ट्रान्सफर पर 25 रुपयेकी फीस लगती है। सरकार ने मोबाइल के जरिए होने वाले अनस्ट्रक्चर्ड सप्लिमेंट्री सर्विस डेटा (USSD) के जरिए 1,000 रुपये से अधिक के ऑनलाइन-ऑफलाइन लेन-देन पर लगने वाले शुल्क में भी 50 पैसे के डिस्काउंट के लिए कहा है। वर्तमान मेंUSSDलेन-देन की लगने वाली डेढ़ रुपये की फीस को सरकार ने 30 दिसंबर, 2016 तक के लिए खत्म कर दिया है।

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